सच्चाई दिखाती कविता। Hindi poem

"मन्दिर लगता आडंबर ,  और मदिरालय में खोए हैं ," "भूल गए कश्मीरी  पंडित ,  और अफजल पे रोए हैं........" "इन्हें गोधरा नहीं दिखा ,  गुजरात दिखाई देता है ," "एक पक्ष के लोगों का ,  जज्बात दिखाई देता है........" "हिन्दू को गाली देने का ,  मौसम बना रहे हैं ये ," "धर्म सनातन पर हँसने को ,  फैशन बना रहे हैं ये......." "टीपू को सुल्तान मानकर ,  खुद को बेच कर भूल गए ," "और प्रताप की खुद्दारी की ,  घास की रोटी भूल गए......." "आतंकी की फाँसी इनको ,  अक्सर बहुत रुलाती है ," "गाय माँस के बिन भोजन की ,  थाली नहीं सुहाती है......." "होली आई तो पानी की ,  बर्बादी पर ये रोते हैं ," "रेन डाँस के नाम पर ,  बहते पानी से मुँह धोते हैं........" "दीवाली की जगमग से ही ,  इनकी आँखें डरती हैं ," "थर्टी फर्स्ट की आतिशबाजी ,  इनको क्यों नहीं अखरती है......." "देश विरोधी नारों को ,  ये आजादी बतलाते हैं ," "राष्ट्रप्रेम के नायक संघी ,  इनको नहीं सुहाते हैं...........

गुरु गोविन्द सिंह जी। Guru Gobind Singh Ji.

7 अक्टूबर 1708 पुण्यतिथि:- दशमेश पिता गुरु गोविन्द सिंह जी।

"सकल जगत में खालसा पंथ गाजे,

जगे धर्म हिंदू सकल भंड भाजे।"

खालसा पंथ के संस्थापक दशमेश पिता गुरु गोविन्द सिंह की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि कोटि नमन।

गुरु गोविन्द सिंह सिख धर्म के दसवे और अंतिम गुरु थे। इनका जन्म २२ दिसंबर १६६६ ई में बिहार राज्य के पटना शहर में हुआ था। गुरु गोविन्द सिंह जी का मूल नाम गोविन्द राय था।गुरु गोविन्द सिंह सैनिको की संगति और सनातन धर्म की रक्षा के लिए खालसा पंथ की स्थापना के लिए प्रसिद्ध थे। गुरु गोविन्द सिंह जी के पिता का नाम गुरु तेग बहादुर तथा माता का नाम गुजरी जी था। १६७५ ई में गुरु तेग बहादुर ने कश्मीरी पंडितों के अनुरोध पर सनातन धर्म के अस्तित्व को बचाये रखने के लिए अपने प्राणो का बलिदान दिया था। तत्पश्चात ९ वर्ष की उम्र में गुरु गोविन्द सिंह जी ११ नवंबर १६७५ ई को राजगद्दी पर विराजमान हुए।

२२,दिसंबर १६६६ को माता गुजरी ने गुरु गोविन्द सिंह जी को जन्म दिया था। गोविन्द सिंह बचपन से ही खिलौने की जगह कृपाण, कटार और धनुष-बाण से खेला करते थे। गुरु गोविन्द जी बचपन से ही शौर्य और साहसिक कार्यों की तरफ स्वयं को अग्रेसित रखते थे। १६७५ ई में गुरु तेग बहादुर ने धर्म की रक्षा हेतु स्वय को बलिदान कर दिया...तत्पश्चात,९ वर्ष की उम्र में गुरु गोविन्द सिंह जी ११,नवंबर १६७५ ई को राजगद्दी पर विराजमान हुए।गुरु गोविन्द सिंह जी सिख धर्म के गुरु पद की गरिमा को बनाये रखने के लिए संस्कृत, फ़ारसी, पंजाबी और अरबी भाषा का ज्ञानार्जन किया और विश्व समुदाय को सिख धर्म के गुरु पद को समझाया। आदरणीय गुरु गोविन्द सिंह जी ने १६९९ ई में इस्लामिक जिहादियों से प्रतिकार, धर्म और समाज की रक्षा के लिए खालसा पंथ की स्थापना की थी। खालसा का तातपर्य है खालिस या शुद्ध जो मन, वचन और कर्म से शुद्ध हो और समाज के लिए समर्पण का भाव रखता हो। गुरु गोविन्द जी ने सभी जातियों का भेद मिटाया और सबमे ना सिर्फ समानता पैदा की, बल्कि उन्हें प्रतिष्ठा और सम्मान भी दिलाया।गुरु गोविन्द जी ने सिख धर्म के लिए पांच ककार अनिवार्य घोषित किया।ये पांच ककार केश, कंघा, कच्छा, कड़ा और कृपाण है, जो सिख धर्म के अनुयायी को युद्ध की प्रत्येक स्थिति में तैयार रहने की प्रेरणा देता है।

अपने जीवन के अंतिम दिनों में गुरु गोविन्द सिंह जी ने सिख धर्म के अनुयायी को एकत्र किया और उन्हें शुभ आचरण करने, देश-प्रेम, धर्म रक्षा और सदा दुखियो की सहायता करने की सिख दी। उन्होंने कहा कि अब उनके बाद कोई देहधारी गुरु नही होगा।अब गुरु का मार्ग गुरुग्रंथ साहिब ग्रन्थ प्रशस्त करेगी, ७ अक्तूबर सन् १७०८ ई. को गुरु गोविन्द सिंह जी का निधन महाराष्ट्र के नांदेड स्थान पर हुई थी।गुरु गोविन्द सिंह जी का जीवन दर्शन हमारा मार्ग प्रशस्त करती है।ऐसे धर्म पथ प्रदर्शक महान गुरु गोविन्द सिंह जी को आज उनकी पुण्यतिथि पर कोटि कोटि नमन है।


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