सच्चाई दिखाती कविता। Hindi poem

"मन्दिर लगता आडंबर ,  और मदिरालय में खोए हैं ," "भूल गए कश्मीरी  पंडित ,  और अफजल पे रोए हैं........" "इन्हें गोधरा नहीं दिखा ,  गुजरात दिखाई देता है ," "एक पक्ष के लोगों का ,  जज्बात दिखाई देता है........" "हिन्दू को गाली देने का ,  मौसम बना रहे हैं ये ," "धर्म सनातन पर हँसने को ,  फैशन बना रहे हैं ये......." "टीपू को सुल्तान मानकर ,  खुद को बेच कर भूल गए ," "और प्रताप की खुद्दारी की ,  घास की रोटी भूल गए......." "आतंकी की फाँसी इनको ,  अक्सर बहुत रुलाती है ," "गाय माँस के बिन भोजन की ,  थाली नहीं सुहाती है......." "होली आई तो पानी की ,  बर्बादी पर ये रोते हैं ," "रेन डाँस के नाम पर ,  बहते पानी से मुँह धोते हैं........" "दीवाली की जगमग से ही ,  इनकी आँखें डरती हैं ," "थर्टी फर्स्ट की आतिशबाजी ,  इनको क्यों नहीं अखरती है......." "देश विरोधी नारों को ,  ये आजादी बतलाते हैं ," "राष्ट्रप्रेम के नायक संघी ,  इनको नहीं सुहाते हैं...........

TRP manipulation and Mumbai Police commissioner

मुंबई पुलिस कमिश्नर परमजीत सिंह ने अभी प्रेस कांफ्रेंस कर बताया कि दो छोटे चैनल्स और रिपब्लिक टीवी के खिलाफ "TRP रेटिंग मैन्युपिलेशन" का मामला दर्ज कर करवाई की जा रही है। परमजीत सिंह की प्रेस कांफ्रेंस से कुछ नतीजे निकाले जा सकते हैं।

मुंबई पुलिस अब "कॉरपोरेट वॉर" का टूल बन चुकी है।

मैन्युपिलेशन के नतीजे मुंबई में लगे सिर्फ दो हजार टीआरपी बॉक्स से निकाले गए हैं।

टीआरपी बॉक्स की इतनी मामूली संख्या से कई सौ करोड़ की "एडवर्टिजमेंट रेवेन्यू" को अपने पक्ष में कर लेने की बात सोचना भी मुंबई पुलिस के "दिमागी दिवालिएपन" को सार्वजनिक कर रहा है। 

एडवरटाइजर दो-तीन सप्ताह की टीआरपी रेटिंग पर निर्णय नहीं लेते। रेटिंग में लंबे समय की स्थिरता के बाद एडवरटाइजर कोई निर्णय लेते हैं।

परमजीत सिंह बार-बार केवल मुंबई में लगे टीआरपी बॉक्स की संख्या का जिक्र कर रहे थे, देशभर के बॉक्स की संख्या ना बताई, ना किसी पत्रकार ने पूछा। इससे आम दर्शक को समझ आता, रेटिंग से एडवर्टिजमेंट और एडवर्टिजमेंट से रेवेन्यू खींचने में दो हजार टीआरपी बॉक्स की क्या अहमियत है ?

परमजीत सिंह का आरोप है, रिपब्लिक और दो छोटे चैनल्स ने उन 2000 घरों के मालिकों को महीने के 400 से 500 ₹ दिए। ताकि ज्यादा से ज्यादा वक्त इन चैनल्स को चलाते रहें। इससे इनकी टीआरपी रेटिंग बढ़े।

यह भी गजब की थ्योरी है। यदि 500 रुपए प्रति घर/प्रति महीने भी मान लिया जाए तो भी 10 लाख रुपए महीने के बनते हैं। क्या दस लाख महीने के खर्च पर 40,000 हजार करोड़ का धंधा बनता है? ऐसा संभव है? यदि वाकई ऐसा है तो टीआरपी सिस्टम वाकई लबर-धों धों है।

दूसरे, मुंबई पुलिस यह कैसे साबित करेगी कि टीआरपी बॉक्स वाकई इन दो हज़ार घर मालिकों को पैसा "रेटिंग मेन्युपिलेशन" के लिए दिए गए। बिजनेस प्रमोशन कोई भी तरीका सामने रखा जा सकता है।

जाहिर सी बात है, टीआरपी बॉक्स आमतौर पर बस्ती, झुग्गी-झोपड़ी इलाकों में लगाए जाते हैं। जिनको पुलिस आसानी से धमका कर बयान ले सकती है।

आप हैरान होंगे, महानगर कोलकाता के मुकाबले हावड़ा में टीआरपी बॉक्सेस की संख्या दो गुनी है। वहां बस्ती हैं। पार्टी कॉडर है। बदले में खबरिया/मनोरंजन चैनल पार्टियों को महीने की मोटी रकम देते हैं। पूरा माल कोई चैनल अकेले थोड़े हजम कर जाता है।

टीआरपी बॉक्स मैन्युपुलेशन में शिकायतकर्ता BARC है। जो टीआरपी बॉक्स और रेटिंग को संचालित करता है। नियमित करता है। यह सूचनाएं BARC के पास रहती है। यानी इनफार्मेशन लीकेज BARC से हुआ। बावजूद, BARC को पड़ताल से बाहर रखा गया। क्यों ?

परमजीत सिंह सैकडों पत्रकारों के बीच से "गुप्ता और गणेश" का नाम लेकर सवाल पूछने को आमंत्रित कर रहे थे। रिश्ते अंदरूनी कहानी बता रहे हैं। कसम से यदि अपन होते तो दो सवालों पर पोंक देते आदरणीय कमिश्नर साहब! 

कुल मिलाकर मुंबई पुलिस मामले में मुंह की खाने जा रही है। यदि यह कोई मामला है भी, तो यह "प्रवर्तन निदेशालय" का मामला है, ना कि पुलिस का। कोर्ट में पहली सुनवाई में परमजीत सिंह के नेतृत्व वाली मुंबई पुलिस मुंह की खाएंगे। तय मानिए। और फायदा रिपब्लिक को मिलेगा।


बावजूद, अपन इस कारपोरेट वॉर के हिस्से नहीं हैं। ना आजतक के। ना रिपब्लिक के। इस दुनिया को बहुत भीतर तक देख-समझ चुके हैं। कारोबारी राष्ट्रवाद से "सुरक्षित दूरी" बनाए रखते हैं।


आभार।


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